पीलीभीत में एएमए के मनमानी के आगे प्रशासन बेबस,तीन दिन में होनी थी जांच?10 दिन बाद भी पत्रावली नहीं ले पाए सीडीओ

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करती हो, लेकिन पीलीभीत जिले में एक अधिकारी ने स्थानीय प्रशासन की नाक में दम कर रखा है। जिला पंचायत के विवादित एएमए (अपर मुख्य अधिकारी) धर्मेन्द्र कुमार अब सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत बनते जा रहे हैं। अपनी कार्यप्रणाली से वह लगातार जिलाधिकारी ज्ञानेन्द्र सिंह के अधिकारों को खुली चुनौती दे रहे हैं। ताजा मामला करोड़ों रुपये की निविदाओं में भारी धांधली से जुड़ा है, जहां जांच के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

​जानकारी के मुताबिक, 25 करोड़ रुपये की ई-टेंडरिंग में गड़बड़ी का मामला अभी थमा भी नहीं था कि एएमए धर्मेन्द्र कुमार ने 20 करोड़ रुपये की नई निविदाओं में भी खेल शुरू कर दिया। इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी ज्ञानेन्द्र सिंह ने मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) सतीश मिश्रा की अध्यक्षता में तीन जिला स्तरीय अधिकारियों की एक जांच कमेटी गठित की थी। डीएम ने बेहद सख्त लहजे में निर्देश दिए थे कि इस पूरे मामले की जांच महज तीन दिन के भीतर पूरी की जाए।

​हैरानी की बात यह है कि एएमए धर्मेन्द्र कुमार ने डीएम के आदेशों को दरकिनार करते हुए सीडीओ को जांच से जुड़ी पत्रावली (फाइलें) सौंपने से ही साफ इनकार कर दिया। हद तो तब पार हो गई जब जांच के आदेश लागू होने के बावजूद, विवादित एएमए ने मनमानी करते हुए निविदाएं भी खोल दीं। इस खुली बगावत और मनमानी की जानकारी मिलने पर सीडीओ सतीश मिश्रा ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि पत्रावली नहीं दी गई, तो वह खुद कार्यालय जाकर अभिलेखों को खंगालेंगे।

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल प्रशासन की ढिलाई पर उठता है। जिस मामले में जिले के मुखिया यानी डीएम ने तीन दिन के भीतर जांच रिपोर्ट तलब की थी, वहां 10 दिन बीत जाने के बाद भी सीडीओ की अगुवाई वाली जांच टीम आरोपी अधिकारी से महज एक फाइल तक नहीं ले सकी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सिस्टम को ठेंगा दिखा रहे इस अधिकारी पर प्रशासन आखिरकार कब लगाम कसता है।

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